पर्यावरण
पर्यावरण
है विकास या पतन,
अब जल भी न मिले बिना धन।
दूषित हो गया पूरा पर्यावरण,
और बात हो रही है खोजने की गगन।
अपनी पॄथ्वी नहीं है सुरक्षित,
हमने प्रगति के नाम पर इसे किया दूषित ।
अपनी ज़रूरत या सुविधा के नाम पर हमने,
कचरे का अंबार जमा किया सबने ।
अब डर रहा है मानव जाएँ कहाँ, रहे कहाँ,
सारा संसार खुद ही जलाकर भर दिया धुआँ-धुआँ ।
जागो मानव जागो,
अपनी गलतियों से मत भागो ।
जब विकास के नाम पर पतन हुआ हमसे,
तो मिलकर अपनी बुद्धि से दूर करेंगे इसे ।
इसी पॄथ्वी पर बनाएँगे प्रगति की ऐसी सीढ़ी ,
नाज़ करेगी हमारी आने वाली पीढी़ ।
