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Ruchika Rai

Abstract

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Ruchika Rai

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प्रकृति

प्रकृति

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प्रकृति हमें अनुपम उपहार देती है,

संग जीने का ढंग हजार देती है,

पेड़ों की चोटी सिखलाती है ऊँचा उठना,

निज उन्नति का स्वरूप हजार देती है।


पतझड़ के बाद आता है बसंत,

बतलाता सदा दुखों का होगा जरूर अंत,

दूर दूर तक फैला हुआ सागर,

आगे बढ़ने के लिए रास्ते बतलाती अनंत।


झरनों से गिरता हुआ जल,

अविरल बहती नदियाँ कल कल,

चट्टानों को चीरकर आगे बढ़ते हुए

बतलाती हर मुश्किल का मिल ही जाता हल।


फूलों से खुशबू जो आती है,

यश की प्रसिद्धि कैसे होती ये बतलाती है,

फलों की गुणवत्ता और मिठास,

आपका स्वभाव कैसा हो यह जतलाती है।


प्रकृति सीख देती हमको हजार,

धैर्य सहनशीलता जीवन में हो हर बार।



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