STORYMIRROR

Ajay Singla

Abstract

3  

Ajay Singla

Abstract

प्रकृति की सीख

प्रकृति की सीख

1 min
276

इक दिन मेरे मन में आया

क्या हूँ ये मैं कर रहा

काम दिन से रात तक

तिजोरियां मैं भर रहा।


निकलना चाह्ता था मैं अब

महफिलों के दौर से

शहर की इस घुटन से

और बेतहाशा शोर से।


मैंने ड्राइवर से कहा कि 

गाडी निकालो अभी

 गाडी में सामान रखो

खाने पीने का सभी।


गाड़ी को लेकर चला मैं

पता नहीं मंजिल कहाँ

मिलें जहाँ कुछ शांत लम्हे

जाना चाहता था वहां।


रास्ते में एक नदी थी

कल कल कर वो बहती थी

बैठा था मैं उसे तट पर

बिन कहे कुछ कहती थी।


आगे मैं जब फिर चला तो

घने जंगल आ गए

ऊँचे ऊँचे पेड़ थे और

हिरन भागे जा रहे।


प्रकृति ने कहा की मुझसे

बातें करो कुछ कहो

सफर ये अनजान से

अक्सर करते रहो।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract