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Rachna Suneel

Abstract

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Rachna Suneel

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प्रेम

प्रेम

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तुम ढूंढ रहे हो भटक रहे हो 

भाग रहे हो ख़ुद ही से ख़ुद में 

मैं स्थिर हूँ शांत हूँ ख़ुश हूँ तुम में

क्योंकि मैंने पाया है प्रेम ख़ुद में..।


तुम नाराज़ हो मुझसे खुद से संसार से

मुझे तो इन सब में प्रेम ही प्रेम दिखता 

है, खुद में तुम में सारे संसार में 

मेरा प्रेम तो कण कण में बसा है..।


तुम्हारे लिए सिर्फ बंधना प्रेम है

मेरे लिए मुक्त होना ही प्रेम है

अनंत है जीवन मृत्यु का भेद

प्रेम को प्रेम से जीना ही प्रेम है..।


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