प्रेम का रंग
प्रेम का रंग
अच्छा सुनो,
इस फरवरी के महीने में बहुत तामझाम है |
हर मोड़ पर गुलाब बिछे हैं,
हर कोना वादों से सजा है,
मगर मोहब्बत की खुशबू भीड़ में कहीं खो जाती है।
तुम प्रेम का रंग ले मार्च में आना |
जब हवाओं में हल्की गर्मी होगी,
जब मौसम बदलने लगेगा,
जब पेड़ों पर नई कोपलें मुस्कुराने लगेंगी,
और हर पत्ता, हर शाख तुम्हारा इंतज़ार करेगी।
फरवरी की शोर भरी मोहब्बत में
हमारी ख़ामोशियों की जगह कहाँ?
ये दिल तो उन पलों का क़ायल है
जहाँ न तारीख़ें ज़रूरी हों, न बहाने,
सिर्फ़ तुम हो, मैं हूँ, और एक बेनाम सा अफ़साना।
तो बस, बिना कहे समझ जाना,
जब फिज़ाओं में हल्की सी ठंडक रह जाए,
जब सूरज की किरणें थोड़ी मुलायम हो जाएँ,
जब इश्क़ बाज़ार की चीज़ न रहकर
फिर से रूह की गहराइयों में बस जाए—
तब तुम आना,
प्रेम का असली रंग ले,
मार्च में आना।

