परछाई !
परछाई !
ये परछाई है या तेरी आहट
कभी आगे तो कभी पीछे
हर कदम पे देती साथ
डरती खुद या मुझे डराती
पल भर में जब गुम हो जाती
कहती न कुछ सुनती
मूक बन बस चलती रहती
सुकून दे दिल को रहबर
धड़कन को न बढ़ने देती
हर साथ का वादा करती
अंधेरों में साथ छोड़ देती
उजालों से दोस्ती होती
अंधेरों में न दूरी होती
डरती मैं खुद अंधेरों से
खुद में समेट न रहने देती।
