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Abhishek Singh

Abstract

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Abhishek Singh

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परछाई !

परछाई !

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ये परछाई है या तेरी आहट

कभी आगे तो कभी पीछे

हर कदम पे देती साथ

डरती खुद या मुझे डराती


पल भर में जब गुम हो जाती

कहती न कुछ सुनती

मूक बन बस चलती रहती

सुकून दे दिल को रहबर


धड़कन को न बढ़ने देती

हर साथ का वादा करती

अंधेरों में साथ छोड़ देती


उजालों से दोस्ती होती

अंधेरों में न दूरी होती

डरती मैं खुद अंधेरों से

खुद में समेट न रहने देती।


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