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Renuka Tiku

Abstract

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Renuka Tiku

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परछाई

परछाई

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खामोशियों के सुनसान अंधेरों में सोचती हूं की कितनी अकेली हूं मैं?-

मेरी प्रत्येक क्रिया अकेली है, किसी सुनसान गली के सन्नाटे सी ।

परंतु तभी एक और आकृति देखती हूं -


 जो बहुत देर से मेरे प्रत्येक हाव-भाव अनुभव के नकल स्वीकृति मालूम होती है।

 मेरे इतने करीब है कि मैं अनुमान नहीं लगा पाती कि वह है कौन?

 तभी सोचती हूं कि हो ना हो यह मेरी ही आकृति की विकृति है।

 जो ना जाने कितने बहरू पिए रूपों में आती है,

 शायद इसके विभिन्न रूप मेरे ही मन: स्थिति का दर्पण है।


 देखो ना तभी तो हर पल मेरे साथ रहती है-

 कभी सर्दियों की काली रात की तरह बढ़ती चली जाती है-- मुझ से कोसों दूर।

 मैं अपना ही प्रतिरूप, जो एक क्षण पहले था,देखने की चाह में एकाएक दौड़ने लगती हूं।

 परंतु मुझसे कहीं चतुर वह पहले ही दूर सड़क जाती है।

 मेरा एक कदम कई कोसों की दूरी बन जाता है।

 हां, शायद यह प्रसन्न चित्त मन की अवस्था थी।


 तभी तो यहां अठखेलियां हो रही थी।

 लेकिन ऐसा भी तो हुआ है--

 मैं नीरस, उदासीन,शुन्य में  खोई सी बैठी थी,

 पाती हूं, एक छोटी सी आकृति मुझे बड़े प्रेम से निहार रही है।

एक क्षण के लिए सोचती हूं कि कौन हो सकता है इतना करीब?

कोई भी तो नहीं है मेरे आस-पास। 


 मगर यह कौन है ?

 भावावेश अश्रु धारा निकल पड़ती है,

 बाहें फैलाकर उसे आगोश में लेना चाहती हो।

 पर अरे! कहां चली गई? शायद मुझसे पहले मुझे समझ गई।

 बाहें भीच लेती हूं।

 

उसे बाहों में भर लेने से न जाने दुख कहां, कैसे फिसल गया।

 काल्पनिक आलिंगन को ही वास्तविकता समझना क्या बुरा है ?

 झूठी सांत्वना ही सही-

 कि वह साथ था- जो कुछ भी नहीं, मगर बहुत कुछ था।


 जो चंदनवन से आती हुई सुगंध की तरह करीब भी है,

चारों तरफ है, और फिर तृप्ति भी तो है- कि कोई तो है पास।

 यह ‘कोई’ कोई नहीं सिर्फ मेरी परछाई है। 


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