STORYMIRROR

Krishna Bansal

Abstract

4  

Krishna Bansal

Abstract

पंख

पंख

1 min
126

एक बार फिर मेरे पंख 

उगने लगे हैं 

वे पंख जो औरों ने 

कतर डाले कई बार 

फिर उगे

फिर काट डाले 

कितनी ही बार 

बार बार उगे 

बार बार कटे।


मैं तड़पती रही 

फड़फड़ाती रही 

जेल में बंद 

कैदी की तरह।


इच्छा है 

अब उड़ान भरने की 

आकांक्षा है अब 

आकाश विचरने की 

वादा रहा मेरा अपने आप से 

अब मैं किसी को अपने रास्ते में न आने दूंगी 

अपने पंख कभी नहीं काटने दूंगी।


यह भी सत्य है 

पिंजरे की आदत 

पता नहीं अब कितनी उड़ान भर पाऊंगी 

पर यह भी जानती हूं 

शक्ति विहीन होकर उड़ते उड़ते गिर कर मरना बेहतर है 

बजाय पिंजरे की सलाखों से 

सिर पटक पटक कर मरने से।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract