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N.ksahu0007 @writer

Inspirational

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N.ksahu0007 @writer

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पिंजरे में कैद पंछी

पिंजरे में कैद पंछी

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पिंजरे में कैद एक पंछी जिसकी व्यथा मैं सुनाता हूँ

भूल गया था उड़ना वो तो उसकी कथा मैं सुनाता हूँ।।


पिंजरे से आकर बाहर आसमान को छूना चाहता हूँ

स्वतंत्र रूप से पंख फैलाकर आज उड़ना चाहता हूँ।।


कैद में रखते हो हमे क्या मैं शोभा घर का बढ़ाता हूँ 

खुली वादियों में जीने दो पिंजरे में जाते डर जाता हूँ।।


बेजुबां साँ हूँ मैं एक परिंदा चु-चु-कर बात बताता हूँ

पिंजरे में कैद होकर दुख से भरे दिन-रात बिताता हूँ।।


सुबह-सुबह खुले आसमाँ में गीत मधुर मैं गाता हूँ

हे मानव पिंजरे में कैद रहकर जीते जी मर जाता हूँ।।


फल फूल पत्ते कीट पतंगा और खुली समर खाता हूं

इन वादियों से रहकर मैं मरकर भी अमर हो जाता हूं।।


खुले आसमाँ में पर फैलाकर उड़ना मैं तो चाहता हूँ

कुतर देते हो पर मेरे चाहूं फिर भी उड़ नही पाता हूँ।।


हूं ना समझ थोड़ा शिकारी के जाल में फस जाता हूँ

मैं पिंजरे में कैद रहकर खुलकर हँस नही पाता हूँ।।


खोल दो पिंजरा उड़ा दो हमे उस खुले आसमाँ पर

आजादी से जीने दो तो मधुर गीत मैं गुनगुनाता हूँ।।


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