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प्रवीन शर्मा

Romance

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प्रवीन शर्मा

Romance

पिंजरे का आजाद

पिंजरे का आजाद

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मैं नही देता, फिर भी,

जाने कैसे, रूठने की वजह मिल जाती है।

वो जब आती है तो,

खुशियों को रखने की जगह कम पड़ जाती है।

मेरी आदत में नही, प्यार कह कर जताना।

चाहती है लव यू शव यू कहूँ ,

इन दो शब्दों के लिए अक्सर लड़ जाती है।


नही करता जिक्र किसी और का उससे,

मैं मर गई हूं क्या, कहकर चढ़ जाती है।

तारीफ करता हूं कभी डर डर के उसकी,

जुल्फें झटक कर आगे बढ़ जाती है।


गुस्से में निकलना चाहूं घर से,

खाना खा कर जाओगे, अड़ जाती है।

मेरा प्यार ज्यादा है, साबित करुँ तो कैसे,

उसके फूलों के आगे इश्क कलियां हल्की पड़ जाती है।


कभी उधार नही रखा किसी का आज तक,

पर उसका चुकाने में मेरी नानी मर जाती है।

वो ना हो तो घर काटने को होता है,

लाली वो लगाती है, मेरी दुनिया संवर जाती है।


कितना आजाद हूँ उसकी बाहों की कैद में,

मैं पंछी हूँ ऐसा जिसे पिंजरे की आदत लग जाती है।

उसके लिए क्या हूँ मैं, पता नही,

मेरी बीबी के बिना मेरी दुनिया आधी रह जाती है।



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