फरियाद
फरियाद
प्रिय डायरी,
जाने क्यों ये मन उदास है,
कहने को सभी अपने पास हैं।
घर बच्चों से भरा संसार है,
पर मन एक कमी को भरने को बेताब है।
कुछ ख्वाहिशें हैं मन में दबी कहीं,
उनको पूरा करने के अरमान हैं।
दुनिया के लिए तो बहुत जिए हम,
कुछ अपने लिए जीने की चाहत है।
फिर याद आतें है बचपन के किस्से,
वो झूले,वो खिलौने,वो खाने के हिस्से।
जिम्मेदारी क्या है वो न थी जिम्मे,
मम्मी की लोरी,पापा की डांट।
यूँ सहमे रहते थे हम अपने ही कोने,
टीचर की आँखों से लगते थे रोने।
मिलता था भाई बहनों का प्यार,
पर अब हो गये हैं हम यूँ दूर-दूर।
मां की ममता हमें आती है याद,
हम करते हैं अब रही फरियाद।
