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Vijay Kanaujiya

Abstract

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Vijay Kanaujiya

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फिर समझो दिल प्रेम मग्न है

फिर समझो दिल प्रेम मग्न है

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नहीं नहीं में हां हो शामिल

फिर समझो ये प्रेम प्रबल है

झुकी-झुकी नजरें तकती हों

फिर समझो दीदार प्रबल है।


आपका मिलना उनको भाए

नज़र मिले पलकें झुक जाएं

जरा सी दूरी लगे सताने

फिर समझो ये प्रेम असर है।


अरमानों के पंख पखेरू

लगें हमेशा विचरण करने

जगने पर भी सपने आएं

फिर समझो दिल प्रेम मगन है।


बिन देखे जब चैन न आए

तन्हाई में दिल घबराए

आंखें हों दर्शन को आतुर

फिर समझो ये चैन गबन है

फिर समझो ये चैन गबन है।


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