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ritesh deo

Abstract

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ritesh deo

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पैसा बहुत है

पैसा बहुत है

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बहुत पैसा है माना, तुम सब कुछ खरीद लोगे ,

बताओ जरा मुस्कुराहट की कीमत क्या दोगे,

क्या भाव लगाओगे तुम भावनाओं का,

रिश्तों को निभाने की कीमत क्या दोगे,


माना ख़रीद लोगे तुम जमीं बहुत,

क्या आसमां जरा सा भी ख़रीद पाओगे,

पानी भी खरीद सकते हो पैसो से मगर,

क्या प्यास की कीमत लगा पाओगे,


बहुत पैसा है माना मगर ,

क्या खुशियाँ खरीद सकते हो,

क्या खरीद सकते हो तुम सुकूँ थोड़ा,

क्या वो बचपन खरीद सकते हो,


बहुत महँगा सा बेड भी खरीद लोगे यूँ तो तुम,

मगर क्या तुम नींद का भाव लगाओगे,

डॉक्टर भी रख लोगे महँगे से महँगा,

मगर स्वस्थ शरीर क्या पुनः पाओगे।


बहुत पैसा है माना मगर क्या खोये हुए दोस्त खरीद सकते हो,

क्या भाव लगाओगे उन यादों का, उन लम्हों का बताओ तो,

क्या वो चौराहे वाली मुलाक़ातें ख़रीद सकते हो ,

बहुत पैसा है माना मगर।


खरीद तो लोगे तुम घर भी बड़ा,

क्या परिवार जुटा पाओगे,

बिन परिवार क्या सिर्फ पैसों से,

घर को घर भी बना पाओगे,

बहुत पैसा है माना मगर, क्या दिन-रातें खरीद सकते हो,

क्या अंतिम क्षण में पैसों से कुछ साँसे खरीद सकते हो।

बहुत पैसा है माना मगर???


असल में पैसे की इस भागा-दौड़ी में मनुष्य जीवन को जीना भूल गए है, जीवन को धीरे-धीरे पैसे के जैसे ही खर्च किये जा रहे है,

लोगों के पास भाइयों- बहनों तथा उन दोस्तों जिन्होंने हर परेशानी में साथ दिया है उनसे ही बात करने के लिए समय नहीं है।

अरे क्या करोगे इतना पैसा कमाकर,

एक बार रोज़ शाम को इस झूठी दुनिया से बाहर निकलो और भाइयों- बहनों और उन बिछड़े दोस्तों को कॉल कर बात करना शुरू करो, 

देखों जीवन कितना सुन्दरमय उपहार है।



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