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हरि शंकर गोयल "श्री हरि"

Classics Fantasy Inspirational

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हरि शंकर गोयल "श्री हरि"

Classics Fantasy Inspirational

ओस की बूंदें

ओस की बूंदें

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मोतियों की मानिंद चमकती

ओस की नन्ही नन्ही बूंदें 

अभिमान से परिपूर्ण 

सोचती हैं कि दुनिया में 

उनसे अधिक बहुमूल्य कुछ नहीं 


दूर्वा के सिर पर विराजमान

दर्प से दमकती हुई 

सतरंगी आभा बिखराते हुये

इठलाती है अपने भाग्य पर 

जिस तरह चूहे को मिल जाती है


हल्दी की एक गांठ और 

समझने लगता है खुद को एक पंसारी 

ओस की बूंदें शायद नहीं जानती 

कि कोमल भावनाओं की तरह 

वे भी कुचली जानी है काल के क्रूर हाथों 

उनकी मासूमियत का कोई मूल्य नहीं है


इस निष्ठुर संसार में 

क्योंकि यहां मासूमियत का 

पल पल गला घोंटा जाता है 

वे रात भर नृत्य करती रहती हैं

मगन रहती हैं मौसम के सुरूर में 

मगर सूरज की किरणों के आघात से

सूख जाती है एक अहसास की तरह 


ओस की बूंदों सा जीवन है हम सबका 

क्षणभंगुर, नश्वर , अल्पकालिक 

मगर फिर भी भरपूर जीवन जीती हैं 

केवल एक रात के लिए

ये नाजुक सी ओस की बूंदें ।

"जब तक जान है तब तक मुस्कान है"

यही संदेश है ओस की बूंदों का 

इसे जान ले जो वही सुखी इंसान है। 


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