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हरि शंकर गोयल "श्री हरि"

Tragedy

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हरि शंकर गोयल "श्री हरि"

Tragedy

ओ स्त्री

ओ स्त्री

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ओ स्त्री, तुम कभी पुरुष नहीं बन पाओगी 

कोमल काया में पाषाण हृदय कहां से लाओगी ?

ओ स्त्री, तुम कभी पुरुष नहीं बन पाओगी। 

तुम निर्झर सी बहती रहती हो 

धरती सा सब दुख सहती हो 

फिर भी हरदम हंसती रहती हो 

पुरुषों की तरह क्या किसी को रुला पाओगी ?

ओ स्त्री , तुम कभी पुरुष नहीं बन पाओगी। 

बुद्ध तो पुरुष थे, चले गये सब छोड़कर 

राज पाट , पत्नी, पुत्र से मुंह मोड़कर 

अपने सारे कर्तव्यों से "हाथ" जोड़कर 

क्या तुम अपने दायित्वों से पलायन कर पाओगी ?

ओ स्त्री , तुम कभी पुरुष नहीं बन पाओगी। 

तुम सीता हो, राम की अनुगामिनी हो 

पतिव्रता निडर साहसी शील रागिनी हो 

अग्नि परीक्षा देने वाली अनुपम भामिनी हो 

क्या अपने राम की कभी अग्नि परीक्षा ले पाओगी ?

ओ स्त्री, तुम कभी पुरुष नहीं बन पाओगी। 

तुम तो जुए में कब की हारी जा चुकी हो 

अपनों के द्वारा प्रताड़ित, दुत्कारी जा चुकी हो 

"कुलटा" "वैश्या" जैसे शब्दों से पुकारी जा चुकी हो 

क्या अपने पति को कभी "दांव" पर लगा पाओगी ?

ओ स्त्री, तुम कभी पुरुष नहीं बन पाओगी।

तुम देवकी हो , कंस नहीं बन सकती हो 

तुम पांचाली हो, निर्वस्त्र नहीं कर सकती हो 

तुम पद्मिनी हो, नरसंहार नहीं कर सकती हो 

"गिरिजा टिक्कू" सी क्या किसी को आरी से चिरवा पाओगी 

ओ स्त्री, तुम कभी पुरुष नहीं बन पाओगी। 

तुम प्रकृति हो, केवल देना जानती हो 

संपूर्ण विश्व को सदा अपना मानती हो 

चुनौतियों से नित नयी "रार" ठानती हो 

क्या सिर्फ खुद के लिए पुरुषों सी जी पाओगी ?

ओ स्त्री , तुम कभी पुरुष नहीं बन पाओगी। 

कोमल काया में पाषाण हृदय कहां से लाओगी 

ओ स्त्री, तुम कभी पुरुष नहीं बन पाओगी। 

ओ स्त्री , तुम कभी पुरुष नहीं बन पाओगी। 



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