नन्ही उम्मीदें
नन्ही उम्मीदें
दिल की बंजर भूमि को तोड़ तोड़,
ऊसर,ब॔जर को
गोड़-गोड़
बोये थे कुछ, ख्वाहिशों के बीज़
अश्रु- जल से सींच- सींच
की बड़े जतन से
देख भाल
अंकुरित होने लगी थी
नन्ही नन्ही उम्मीदें,
कुछ बड़ी हुई,,और हरी हुई
कुछ पीली पड़ी और मर सी गई
कुछ सर उठाए खड़ी हैं
शान से,
झाँकती शरारती बच्चो सी,मुस्काती,
फैलती जा रही हैः
मेरे दिल की जमीं पर
ये नन्ही उम्मीदे
,
इंतजार है अब,
कब बड़ी होगी, फूलेंगी, फलेगी
मेरी----' ये नन्ही नन्ही उम्मीदें
ये नन्ही नन्ही उम्मीदें।
