निरांजल
निरांजल
हमारे अफसाने को शब्दों से सजाकर,
मैं निरांजल लिख रही हूं।
दिल की रेत में चलकर जो तुम आए,
मै वो कदम मिला रही हूं।
डर था तुम्हें खोने का,
इसलिए इकरार करने से कत्राई थी,
क्या पता था हां बोलकर भी,
कौनसा तुम्हें पाउंगी।
छेड़ा था जिसने मुझे,
मै उस डर से तुम्हारी मुलाक़ात करवा रही हूं,
ना समझे एहसास को पढ़कर,
मै निरांजल लिख रही हूं।
देहलीज़ के पार घंटों खड़े करवाकर,
मै अपना इंतज़ार जता रही हूं।
वहीं राह चलते लोगों की वो अजीब सी नज़र का,
मैं नज़ारा दिखा रही हूं।
हर मुश्किल से सफर में मिल जाता है एक जरिया,
पर तुम्हें तो साथ चलना नहीं था,
मै तो बस पीछे खड़े रहकर तुम्हारे पास रहना चाहती थी,
पर तुम्हें तो मेरा साया भी मंजूर नहीं था।
झूठ का आईना तोड़कर,
मै सच दिखाने की कोशिश कर रही हूं।
अपनी कहानी के कुछ पन्ने छोड़कर,
मैं निरांजल लिख रही हूं।
ज़मीन में बिछे सफेद चादर में,
मै सूखी डंडी से तुम्हारा नाम लिख रही हूं।
अधूरे से छूटे उन लम्हों को,
मैं पन्नों में भरकर पूरा कर रही हूं।
समुंदर सी जिंदगी में किनारे तक पहुंचाते,
ना जाने कब ऐसी कश्ती बन गए,
मुशायरों की महफ़िल में रंग की क्या ज़रूरत,
जब घज़ल बनकर तुम मेरी नज़्म बन गए।
मिले कब कहा कितने लम्हे गुजारे,
मैं गिन गिन के सारे पल लिख रही हूं,
तस्वीर नहीं है कोई हमारी,
मैं निशानी संभालकर निरांजल लिख रही हूं।

