नदियाँ
नदियाँ
अरे भाई रुको तो
क्यूँ बेकार करते हो ये जल ?
जाओ जाकर कहीं और त्यागो,
अपना ये दुर्गांधित मल।
लो देखो एक और चला आया,
अपने साथ लिए कचरे का ढेर,
सब इसको ये उलट देगा पलभर में,
नहीं करेगा ज़रा भी देर।
प्रदूषित होती गंगा बेचारी,
धीरे - धीरे उसे लगती बीमारी,
कोई उसकी व्यथा समझ नहीं पाता,
औरों पर है दोष लगाता।
हम हर सकते हैं उसकी बीमारी,
स्वच्छ करके उसकी प्रदूषित क्यारी,
चुन - चुन कर उसमे से कूड़ा निकालें,
अपने रसायनों को वहाँ ना डालें।
कपड़ों को धोऐं घर के अंदर,
साबुन बहे तब नाली के ही अंदर,
गाय, भैंस सब बाहर नहलाऐं,
गंगा नदी को पूजनीय बनाऐं।
नदियाँ हमें हैं जीवन देतीं,
जल के स्त्रोत का करतीं विस्तार,
अगर इन्हें हम करते रहेंगे प्रदूषित,
तो मच जाएगा हाहाकार।
