ना जाने कहां-- ना जाने किधर❤❤
ना जाने कहां-- ना जाने किधर❤❤
वक़्त की आँधी चली,
दिल की शाखों से
टूटे उम्मीदों के पत्ते---ऐसे---
पेड़ से टूटे पत्ते जैसे
फिरते हैं, आवारा
यूं ही गली-गली,
कि,मंजिल से भटके हुओं
को,कोई नाखुदा
ना मिला हो जैसे----
बस यूंही इस तरह
कभी-कभी भटकता
हुआ दिल मेरा,
टूटे हुए पत्तों की मानिंद,
बन कर आवारा----
फिरता है---गली-गली
चल पड़ता है----
उस राहगुज़र पर---
किस फिराक में,
यूंही----दम ब दम
भटकता रहता है----
जा पहुंचता है कहीं का कहीं----
ना कोई राह,ना कोई मंजिल----
भटकता ही रहता है,
उड़ता ही रहता है-----
साथ लिये---- टूटे ख्वाब,
टूटी उम्मीदें-----
ना जाने कहां
ना जाने किधर,
ना जाने क्यों ?
