STORYMIRROR

Renu Mishra

Abstract

3  

Renu Mishra

Abstract

मुर्दा खामोशी

मुर्दा खामोशी

1 min
590

तेरे जग में भीड़ बहुत है

आगे बढ़ने की होड़ बहुत है


मंज़िल की मुर्दा खामोशी 

रस्तों का पर शोर बहुत है


ख़्वाबों के साये को थामे

जीने की घुड़दौड़ बहुत है


बुत से दिखते चलते फिरते

मरे हुओं की फ़ौज बहुत है


पीठ में खंज़र...भोकते

प्यार जताते यार बहुत है 


झूठ की इज़्ज़त शान बढ़ाते

सच्चाई की हार बहुत है


अंबर को छूने की कोशिश 

धरती पर लाचार बहुत है


मानवता की जात बताते

मज़हब के व्यापार बहुत हैं 


लेखकों की भीड़ में गुम 

पाठकों की माँग बहुत है 


सहरा में दो बूँदे ढूँढे

सागर की ये प्यास बहुत है


हरित आभा धरती का छीने

बस्ती के विस्तार बहुत हैं


मोहब्बत के इक ठौर को तरसे

नफ़रत के आधार बहुत हैं


तनहाई से अपने लड़ते

तेरे जग में भीड़ बहुत है


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract