STORYMIRROR

Renu Mishra

Abstract

3  

Renu Mishra

Abstract

जीवन चक

जीवन चक

1 min
265

अपनी ही परिधि में 

यूँ घूम रहे हैं

खो आए क्षणों को 

फिर से खोज रहे हैं

बिछड़ गए थे 

जिन राहों पर कुछ साथी

बीते पलों से उन्हें 

फिर पूछ रहे हैं

चले थे जिस जगह से 

गर वहीं था पहुँचना 

इतना सफर फिर 

क्यों तय किए हैं 

ईश्वर का था बस 

मनोरंजन ये नाटक

जिस जिन्दगी को हो

 संजीदा हम जिए हैं

खोना ये पाना 

मिलना औ बिछड़ना

सफलता विफलता 

मंजिलों तक पहुँचना

था बस खिलौना 

ख्वाबों का फसाना

आँखें खुली तब ही

जाना है सब ये

कारगुज़ारी सब उसकी 

माना तब मन ये

है जबतक ये नाटक 

है तब तक बसेरा

देखें फिर कहाँ डलता है डेरा,

डलता है डेरा....!!!


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract