मुकाम
मुकाम
अब क्या अन्तर कि कौन
कहाँ किस मुकाम पर है,
अन्तर तो बस इससे है
कि उसने क्या बाँटा है
श्रेष्ठ कर्म, श्रेष्ठ विचार या अपरिमित स्नेह !
कर्म और विचारों की
श्रेष्ठता किसी को
महान बना सकती है
परन्तु निश्छल स्नेह तो
उस ईश्वर का ही
साक्षात्कार कराती है।
महान लोगों को समय
विस्मृत कर सकता है
पर स्नेह वर्षा को
भूलना सम्भव नहीं !
क्योंकि ईश्वर को कोई
कभी भूल नहीं सकता।
उसकी सत्ता को
नकार सकता है,
परन्तु स्नेहमय स्पर्श को
अनवरत अनुभव करता रहता है !
स्नेह सुधा सबके अन्दर
भरा है उसने भरपूर,
कितना अच्छा हो
इसे बाँटने का
बना ले जग दस्तूर !
