मंजिल; एक पड़ाव
मंजिल; एक पड़ाव
दुनिया के ग़म सहते हुए
दिल पे कई सितम सहते हुए
वक्त की धार में बहते हुए
कर लिया मैंने हासिल
पा लिया है मैंने मंज़िल ।
मंज़िल को एक पड़ाव मानता हूँ
हर पड़ाव से जुड़ाव मानता हूँ
पता है नहीं है मुकम्मल
पाई है जो मैंने मंज़िल ।
दौर बदला हालात भी बदले
जज़्बात लूटने कई ख्यालात बदले
अपनाया न किसी को, न किया शामिल
पा लिया है मैंने मंज़िल ।
कई बार तबाह हुए तो मिली वाह
वाह ने किया हौसला आफजाह
और भटकता रहा गाफिल
और पा लिया एक मंज़िल ।
