मन
मन
मन
मन के अंदर दुष्ट छिपे हुए
काम, क्रोध, मद, लोभ और मत्सर
द्वेष, राग करें हम दूजे से
ईर्ष्या रखें हृदय में भरकर ।
मनुष्य मनुष्य से झूठ बोल रहा
सत्य कहने से ये डरता है
जानता है कि ग़लत कर रहा
सदैव पापों का घड़ा भरता है ।
मैल जो मन में है निकालो
ज्ञान से अब तुम मन को भर लो
पहला सब उड़ेल दो बाहर
भर पाएगा तभी, जब ख़ाली हो ।
पुण्य कमाना भी ये चाहे
पर ना जाने कैसे करे ये
हे प्रभु, सदबुद्धि दो हमें
फर्क जान सकें सच - झूठ में ।
जानते हैं कि जन्म लिया है
मृत्यु भी साथ में आई इसके
हर पल डर लगा रहता फिर क्यों
अखण्ड है जन्म मृत्यु का चक्र ये ।
सुबह हुई तो शाम भी होगी
घुप्प अंधेरा भी घेरेगा
प्रकाश की किरणें पाटेंगी इसको
नया एक दिन फिर रोशन होगा ।
तेरी माया तू ही जाने
हम तो तेरे हैं खिलौने
खेल ले जैसे खेलना चाहे
बस रखना अपने चरणों में ।
जब चाहे मुक्ति दे देना
हमको इस संसार चक्र से
भक्ति हो तुममें, बुद्धि हो ऐसी
लगें रहें ना हम दोषों में ।
दुष्ट हृदय भागे विषयों में
अपनी और आसक्तियाँ खींचें
पापकर्म से हमें बचाना
कर्मपथ को हम पुण्य से सींचें ।
बहुत समय से सोच रहा कि
जो कर रहा, क्या व्यर्थ है सारा
सत्य -असत्य का भेद ना जानूँ
हे प्रभु दो मुझको सहारा ।
