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Ajay Singla

Inspirational

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Ajay Singla

Inspirational

मन

मन

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मन 


मन के अंदर दुष्ट छिपे हुए 

काम, क्रोध, मद, लोभ और मत्सर

द्वेष, राग करें हम दूजे से 

ईर्ष्या रखें हृदय में भरकर ।


मनुष्य मनुष्य से झूठ बोल रहा 

सत्य कहने से ये डरता है 

जानता है कि ग़लत कर रहा 

सदैव पापों का घड़ा भरता है ।


मैल जो मन में है निकालो

ज्ञान से अब तुम मन को भर लो 

पहला सब उड़ेल दो बाहर 

भर पाएगा तभी, जब ख़ाली हो ।


पुण्य कमाना भी ये चाहे 

पर ना जाने कैसे करे ये 

हे प्रभु, सदबुद्धि दो हमें 

फर्क जान सकें सच - झूठ में ।


जानते हैं कि जन्म लिया है 

मृत्यु भी साथ में आई इसके 

हर पल डर लगा रहता फिर क्यों 

अखण्ड है जन्म मृत्यु का चक्र ये ।


सुबह हुई तो शाम भी होगी 

घुप्प अंधेरा भी घेरेगा 

प्रकाश की किरणें पाटेंगी इसको 

नया एक दिन फिर रोशन होगा ।


तेरी माया तू ही जाने 

हम तो तेरे हैं खिलौने 

खेल ले जैसे खेलना चाहे 

बस रखना अपने चरणों में ।


जब चाहे मुक्ति दे देना 

हमको इस संसार चक्र से 

भक्ति हो तुममें, बुद्धि हो ऐसी 

लगें रहें ना हम दोषों में ।


दुष्ट हृदय भागे विषयों में 

अपनी और आसक्तियाँ खींचें

पापकर्म से हमें बचाना 

कर्मपथ को हम पुण्य से सींचें ।


बहुत समय से सोच रहा कि

जो कर रहा, क्या व्यर्थ है सारा 

सत्य -असत्य का भेद ना जानूँ 

हे प्रभु दो मुझको सहारा ।



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