मन
मन
मैंने मन ही मन कभी ईश्वर को इतना नही पुकारा
जितना उसे पुकारा,
हर चीज से परे मेरी आस्था
उसके नाम में अधिक रही
उसकी हथेलियाँ संसार भर की खुशबुओं से रंगी थी
और मन जोगी के सफेद सादा कपड़े में लिपटा था
अपने झर रहे मन की परवाह छोड़
वो उम्र भर
पारिजात के फूल सा बिखरा रहा सबके जीवन में
वो सोचता बहुत था,मगर चुप रहता
उसकी चुप्पी उदासी से नही, खालीपन से भरी थी
वो टालता रहा अपना रोना
जिम्मेदारियों ने उसे कभी
दुःख मना सकने की भी नही दी सहूलियत
वो एक ऐसा पहाड़ था जिसके नसीब
एक छोटी नदी भी ना आयी
अपनी पीड़ाएं बहा देने को
वक़्त हर घाव भर सकता है
मगर जड़ समेत कहीं और रोप दिए गए पेड़ों की बेआवाज
सिसकियां नहीं सुन सकता।
वो खुले आसमान का पंछी था
दुनिया गढ़ती रही उसके लिए पिंजरे,
सीमाओं से भरी इस दुनिया में
मैं उसे खो देने जितना नही पाना चाहती
मैं बस उसे आँख भर देखना चाहती हूँ
मीलों दूर से भी उसका हाथ कस कर थाम
उससे कहना चाहती हूँ कि–
"तुम हो, सही हो, मुझे बस तुम्हारे होने में ही सुख है।"
