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ritesh deo

Abstract

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ritesh deo

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मन

मन

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मैंने मन ही मन कभी ईश्वर को इतना नही पुकारा⁣

जितना उसे पुकारा,⁣

हर चीज से परे मेरी आस्था⁣

उसके नाम में अधिक रही⁣

उसकी हथेलियाँ संसार भर की खुशबुओं से रंगी थी⁣

और मन जोगी के सफेद सादा कपड़े में लिपटा था⁣

अपने झर रहे मन की परवाह छोड़ ⁣

वो उम्र भर ⁣

पारिजात के फूल सा बिखरा रहा सबके जीवन में ⁣

वो सोचता बहुत था,मगर चुप रहता⁣

उसकी चुप्पी उदासी से नही, खालीपन से भरी थी⁣

वो टालता रहा अपना रोना⁣

जिम्मेदारियों ने उसे कभी ⁣

दुःख मना सकने की भी नही दी सहूलियत⁣

वो एक ऐसा पहाड़ था जिसके नसीब⁣

एक छोटी नदी भी ना आयी⁣

अपनी पीड़ाएं बहा देने को⁣

वक़्त हर घाव भर सकता है ⁣

मगर जड़ समेत कहीं और रोप दिए गए पेड़ों की बेआवाज⁣

सिसकियां नहीं सुन सकता।⁣

वो खुले आसमान का पंछी था⁣

दुनिया गढ़ती रही उसके लिए पिंजरे,⁣

सीमाओं से भरी इस दुनिया में⁣

मैं उसे खो देने जितना नही पाना चाहती ⁣

मैं बस उसे आँख भर देखना चाहती हूँ⁣

मीलों दूर से भी उसका हाथ कस कर थाम ⁣

उससे कहना चाहती हूँ कि–⁣

"तुम हो, सही हो, मुझे बस तुम्हारे होने में ही सुख है।"⁣


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