STORYMIRROR

Rachna Chaturvedi

Abstract

4  

Rachna Chaturvedi

Abstract

मन की बात

मन की बात

1 min
168


अंतर्मन के कुरुक्षेत्र में 

धर्मयुद्ध चल रहा निरंतर

सूर्योदय से सूर्यास्त तक

सूर्यास्त से फिर सूर्योदय तक

निरंतर अनवरत अनंत सा,


अंतर्मन के कुरुक्षेत्र में

प्रश्न खड़े हैं योद्धा से

शस्त्र उठाए

अस्त्र उठाए

आघात प्रत्याघात करते

लड़ते मरते आहत होते,


ये प्रश्न भरे हैं पीड़ा से

दुविधा से आशंका से,


कुछ हारे से कुछ मारे से

कुछ राह खोजते भटके से

कुछ सीना ताने बढ़ते से

सर्वनाश को आतुर से,


अंतर्मन के कुरुक्षेत्र में

धर्मयुद्ध चल रह निरंतर,


प्रश्नों का संहार बने से

उत्तर भी हैं खड़े हुए

तर्क वितर्क कुतर्क 

हाथ में तलवारों से लिए हुए

प्रश्नों का सिर कुचल कुचल कर

विजय दंभ से भरे हुए,


किंतु 

खड़े हैं हारे से

प्रश्नों के आघातों से


अंतर्मन के कुरुक्षेत्र में

धर्मयुद्ध चल रहा निरंतर।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract