STORYMIRROR

Pankaj Kumar Patodi

Tragedy

2  

Pankaj Kumar Patodi

Tragedy

मन बावरा

मन बावरा

1 min
382

कभी सोचता हूँ कि क्यों हवाओं में ये ज़हर घुल रहा हैं

फिर समझ लेता हूँ की क़िसी ने छोड़ दिया अपना कर्तव्य


समझ नहीं पाता कि मैं क़ैसे निभाऊँ अपना धर्म

क्या छोड़ जायेंगे हम अपनी विरासत में।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

More hindi poem from Pankaj Kumar Patodi

Similar hindi poem from Tragedy