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अनिल श्रीवास्तव "अनिल अयान"

Abstract

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अनिल श्रीवास्तव "अनिल अयान"

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मजहब की आड़ लेकर गुल खिला रहे

मजहब की आड़ लेकर गुल खिला रहे

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मजहब की आड़ लेकर गुल खिला रहे हो।

इंसानियत को तुम क्यों उल्लू बना रहे हो।


दो कौड़ी की राजनीति दिखा कर बाजार में

करोड़ों के होटलों में तुम पार्टी मना रहे हो।


चलाना था देश को और हटाना था गरीबी 

गरीबों को छिपाकर शाबाशी लुटा रहे हो।


देश में बेरोजगारी का रस्ता न खोज पाए।

युवाओं के हाथों में तलवारें थमा रहे हो।


क्यों बलात्कारियों को फांसी न दे सके तुम

न्यायालयों में खुद का सिक्का जमा रहे हो।


अच्छे दिनों के वायदे काले धन की वापसी

 शेखचिल्ली के सबको सपने दिखा रहे हो।


विधायकों की खरीदी काली रात के अंधेरे 

क्यों संविधान की तुम लुटिया डुबा रहे हो।


फुटपाथ में पड़े हैं बिन रोटी कपड़े मकां के

तुम अट्टालिकाओं से लतीफे सुना रहे हो।


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