STORYMIRROR

सुरशक्ति गुप्ता

Abstract

4  

सुरशक्ति गुप्ता

Abstract

मेरी मां

मेरी मां

1 min
98

मां की होठों की मैं लाली हूँ

मै अपनें पिता की आखों का नूर। 


नूर सजाए फिरते हैं

एक दिन कर देंगे अपने से दूर। 


फिर मै दूसरों के चरणों की

पादुका बन जाउंगी 


जिसे न भरत उठाएंगे और

न मैं सीताराम कहलाऊँगी।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract