STORYMIRROR

सुरशक्ति गुप्ता

Abstract

4  

सुरशक्ति गुप्ता

Abstract

रंगोत्सव

रंगोत्सव

1 min
289

मैं रंगो का किरदार हूं

हर चेहरे पर बखूबी नजर आता हूं

उन्माद कितना भी काला क्यों न हो

रंगो के इस फुहारे में

मैं अपना चटक छाप छोड़ जाता हूं...

कुछ ऐसे रंग बिरंगी किरदार हैं 

जिनसे मैं रोज मिलता हूं 

उनको देखता हूं 

समझता हूं

पर वक्त के धरातल में 

मैं उन्हें तौल नहीं पाता हूं

कभी पलड़ा भारी 

तो कभी हल्का 

अंदाज़ो के बिखरे रंगों से 

मैं जिदगी के हर रंग से होली खेल जाता हूं

यह रंग कच्चा ही सही

पर हर शब्द पर अपना अभिमान जताता हूं

मैं रंगो का किरदार हूं साहब!

हर किरदार पर रंगोत्सव की भूमिका निभाता हूं...


 


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract