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Monika Garg

Abstract

5.0  

Monika Garg

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मेरे कमरे की शिकायत

मेरे कमरे की शिकायत

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मेरे कमरे को अक्सर,

मुझसे शिकायत रहती है।

क्या गम मुझको बता,

क्यों तू चुप चुप सी रहती है।


मेरे इस कोने को तुमने,

जो गुलदस्ते से सजा रखा है।

मेरी इन दीवारों पर,

रंग बिरंगी तस्वीरों को लगा रखा है।


पर फिर भी मैं तेरे बगैर,

तनहा महसूस करता हूं।

तुझे शायद खबर नहीं

मैं हर वक़्त तेरी उड़ीक करता हूं।


तू आती और चली जाती है,

मुझसे बात ना करती है।

मेरे कमरे को अक्सर,

मुझसे शिकायत रहती है ।


प्यार से कभी तुमने,

मेरी तरफ ना देखा।

देखो इस अलमीरा पर 

साफ़ दिख रही धूल मिट्टी की रेखा।


ऊपर मेरी छत पर,

यह जो पंखा टंगा हुआ है।

टर टर कर चलता,

जैसे कोई घिस रहा है।


तेरे पास मेरे लिए 

पल भर भी समय नहीं है।

पल भर तो देख मेरी तरफ, 

या मुझसे प्रेम नहीं है।


हर वक्त क्यों तू खुद को,

इतना व्यस्त रखती है।

मेरे कमरे को अक्सर,

मुझसे शिकायत रहती है।


कब तक सूना सूना,

मैं रहूं तुम बिन।

मुझ में रौनक तुम्हीं से, 

तुम ही से मेरा हर दिन।


मुझसे नाराज हो क्या ?

क्यों मुझ से बेखबर सी रहती है।

मेरे कमरे को अक्सर

मुझसे शिकायत रहती है।


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