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सुरशक्ति गुप्ता

Abstract

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सुरशक्ति गुप्ता

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मेरे अपने

मेरे अपने

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क्या सोचूं और कितना सोचूँ 

हर घड़ी कितना किस्से बोलूं 

अब शब्द टूटने लगे हैं 

और वाक्य अपना अर्थ बदल रहे हैं 

शुद्धता की नापतौल में अपने

अपनों से छूट रहे है.....


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