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Monika Sharma "mann"

Abstract

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Monika Sharma "mann"

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मेरा जूता

मेरा जूता

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जूता बदल देता है इंसान मुझे अपनी

जरूरत खत्म हो जाने पर मगर

मैं वह हूंँ जो दूर तक साथ चाहता हूंँ उसके।


पहनता है मुझे अपने लिबाजों के हिसाब से वह 

फैशन परस्ती में नया रूप ले मैं भी इठलाता हूंँ। 


दिनभर की धूल मिट्टी खाकर झाड़ देता है

मुझे जोर से वह छोड़ देता है दहलीज पर

अपनी जैसे उसका वफादार हूंँ।


रंग, रूप और बनावट से किरदार बदल देता है

मेरे गर ना हूँ आरामदायक तो उसके लिए नालायक हूंँ।


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