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Rinkal Patel

Tragedy

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Rinkal Patel

Tragedy

मेरा भारत

मेरा भारत

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कहते हैं, कुछ टुकड़ों में बँट चुका है भारत मेरा,

कहीं भेदभाव तो कहीं ऊँच-नीच में उलझ रहा है,

आज से नहीं, सालो से ये सिलसिला चला आ रहा है,


केहते है, वो कमजोर औरते घर में ही प्यारी लगती हैं,

और वो मरदानी दिखाने वाले मृद हमेशा टत पर रेहते हैं, 

कहीं दूर दबाई जाती हैं उस मासूम की चीख,

यही है पुरानी हमारी सभ्यता और सीख ?


शायद इसी गलतफहमीऔ में उलझ रहे हैं हम सारे, 

शायद किसी ओर भारत में जी रहे है हम प्यारे,

क्यूंकि उनकी सोच से क्यों आगे बढ़ चुके हैं,

अरे इस उंच-नच को काफी दूर छोड़ चुके हैं,


वो कमजोर औरतें आज सिहाँसन संभाल रही हैं,

ओर वो मरदाने उसी सिहाँसन के पीछे खड़े हैं,

वो मासूम का आज शायद कोई नहीं साथी, 

लेकिन अपने हाथो में बसाली है उसने अपनी लाठी,


वो पुरी दुनिया में कहीं दूर छुपा हुआ भारत,

आज देश भर में चेहक रहा है,

अरे ये तो शूरवात है उस मंजिल की, 

जिस राह पर कई कांंमयाबिया ओर खड़ी हैं,


एक साथ चलेंगे तो लगेगा सफर प्यारा,

फिर ही तो कह पाऐंगे के "ये है भारत हमारा",

क्यूंकि जिस राष्ट्रगान को सून,


गर्व से खड़ा ना हुआ वो इंसान, भारतीय नहीं,

और वो कहीं खामोश रहने वाला अब, 

मेरा भारत नहीं !


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