STORYMIRROR

Neha Sherkar

Abstract

4  

Neha Sherkar

Abstract

मैं

मैं

1 min
151

मैं वो जमीन तेरी जहाँ

मीलों का सफर तू तैर कर,

साथ चलूँ तेरे कदमों के

निशान समेटकर।


मैं वो आसमान तेरा

जहाँ चांद गहराता जाऐ,

तेरी कड़कती धूप में मेरी

चांदनी का पहरा बढ़ता जाऐ।

मैं वो किताब तेरी


तू हर पन्ना पढ़ता जा,

लब्ज बनकर उंगलियों

पे ठहरूंगी,

तू बेशक इसे धूल समजता जा।

मैं वो दीवार तेरी,


जो तुमने पत्थरों से है सींची

मेहमान बनके आना कभी

हमने घर की ईंट इसपे रखी।

मैं वो राह तेरी,


मुसाफिर बनके आना तुम

जरियॉं हमेशा बनूगीं

मुकाम हमें बनाना तुम।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

More hindi poem from Neha Sherkar

मैं

मैं

1 min पढ़ें

तू

तू

1 min पढ़ें

Similar hindi poem from Abstract