STORYMIRROR

GUDDU MUNERI "Sikandrabadi"

Abstract

4  

GUDDU MUNERI "Sikandrabadi"

Abstract

मैं सोच रहा हूँ यहाँ

मैं सोच रहा हूँ यहाँ

1 min
384

मैं सोच रहा हूँ यहाँ 

तुम सोच रही हो वहाँ 

कब हो जाए हम 

एक और एक ग्यारह।


एक और एक ग्यारह

एक और एक गयरह।

इस नगरी के इस महल में 

हम दोनों की एस पहल में 

प्यार का कोई मोल नही 

आ मिल जाए और फ़िर बनाए 

एक और एक ग्यारह।


एक और एक ग्यारह

एक और एक गयरह।

प्यार किया तो डरना क्या 

ना बजेंगे किसी के बारह 

क्युंकि हम तो है 

एक और एक ग्यारह।


एक और एक ग्यारह

एक और एक गयरह।

प्यार की दुनिया का 

एक वही रचेता,

जिसके चाहे गम और 

जिसको चाहे खुशियाँ दे दे

और फ़िर बन जाए 

हम एक और एक ग्यारह।


एक और एक ग्यारह

एक और एक ग्यारह।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract