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Savita Patil

Inspirational

5.0  

Savita Patil

Inspirational

मैं, मैं हूं

मैं, मैं हूं

2 mins
840


मैं, मैं हूं और सदा मैं ही रहूं

मैं क्यों खुद को बदलूं ?

मेरी सोच मेरी है,

जानती हूं ये खरी है !

मेरा हृदय अनमोल है,

कुछ है तो प्रेम ही इसका

मोल है!

इसे न लालसा धन की,

न यह मांगे ऐशो-आराम

न इसे चाहत वैभव की !

बस दो वक्त रोटी और

ज़िन्दगी मिले चैन की !

 

वो बदले खुद को

जिनके हृदय पाषण

होते है,

जो दिखते तो है जिंदा,

पर बेजान होते है !

वो बदले जो रिश्तों को

एक क्रमांक बना देते हैं,

हर इतवार बात करना

अपना व्यथा फर्ज़ बना लेते है !

 

वो बदले जो जीवित मर्म भाव

जीवन भर नज़र–अंदाज़ करते है,

और फिर उन्हीं निस्पंद देहों को

श्रध्दांजलि देते है, याद करते है !


बदले उन्हें जो शामिल है

चुहों की दौड़ में,

आत्मीयता से परे, रूपयों

की होड़ में !

 

मैं खुश हूं जो मैं हिस्सा नहीं

किसी प्रतियोगिता का,

मैं खुश हूं जो मुझे प्रमाण नहीं

देना अपनी योग्यता का !

 

ऐसा नहीं कि मेरे सपने नहीं,

ऐसा भी नहीं कि

मेरा कोई ध्येय नहीं,

बस, बात इतनी-सी है

मेरे खुश होने की कोई

शर्त नहीं !

 

दिल इस बात से खुश हो जाता है कि

कभी– कभार कोई, मेरे घर आ जाता है

मन ये देख मचल उठता है,

कि चाँद आज भी मेरे

झरोखे से दिखता है !

 

इस भागती – दौड़ती दुनिया में

ढूंढ लेता है दिल मेरा, अपनों को !

बढ़ती दुरियों में, ये समझता है

जरूरत मिलने – मिलाने की,

स्पर्श की भावना मैं जानती हूं,

चाँद को नहीं, मैं इंसानों को

छूना चाहती हूं !

 

रोज़ बदलती है दुनिया

पर मैं, मैं ही रहना चाहती हूं!

बाहर कुछ भी दिखे,

पर अपने भीतर

मैं खुद को जिंदा देखना चाहती हूं !

मैं खुद को जिंदा देखना चाहती हूं !


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