मैं, मैं हूँ और सिर्फ मैं हूँ
मैं, मैं हूँ और सिर्फ मैं हूँ
मैं, मैं हूँ ,
चाहे जैसी भी हूँ..
खुद से ही खुश हूँ ,
चाहे कैसी भी हूँ..
न मैं अति सुन्दर न छरहरी,
ना ही नायिकाओं सी काया है मेरी..
पर खुद पे ही है नाज़,
आत्मविश्वास और संबल ही
छाया है मेरी..
क्या करूँ क्या नहीं,
अब नहीं करनी किसी की परवाह..
अब तो लगता है वही करूँ,
जो दिल में दबा के रखी थी चाह..
बच्चे उड़ चुके या उड़ने वाले हैं,
घोसलों से नई दिशाओं में..
हम भी चुनेंगे अब अपने पसंद की जमीं,
और आसमां नई आशाओं में..
अब अपने घोंसले को ही नहीं,
खुद को भी सजाना है..
बहुत मनाया सबको,
अब खुद को भी मनाना है..
सूख चुकी उम्मीदों को,
फिर से सींचना है..
रुठी हुई ख्वाहिशों को ,
गले लगा भिंचना है..
जीऊँगी जिंदगी को फिर से,
अब नए उमंग में..
लिए अपनी तमन्नाओं को ,
अपने संग में..
थाम हाथ में जुगनुओं को ,
फिर से खिलखिलाऊँगी..
नए सफर को नई उम्मीदों की,
रौशनी से जगमगाऊँगी
फिर से बचपने के करीब हूँ,
लिखूँगी फिर से अपनी ज़िन्दगी..
मैं अब खुद ही, अपना नसीब हूँ..
