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Lokesh Dangi

Abstract Inspirational Others

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Lokesh Dangi

Abstract Inspirational Others

मैं इंसान हूँ, पर पूरा नहीं

मैं इंसान हूँ, पर पूरा नहीं

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मैं इंसान हूँ, पर पूरा नहीं,

टूटे ख्वाबों का शीशा हूँ कहीं।

चलता रहा जो राहों में बेखबर,

अपने ही साये से हारा हूँ यहीं।


सोचा था आसमान छू लूँगा,

हवा बनके बेखौफ बहूँगा।

पर ज़मीं ने जकड़ लिया पैरों को,

अब बस इक साज़िश में जीऊँगा।


हँसी की परछाइयाँ दिखती हैं,

आँखों में मगर वीरानियाँ बसती हैं।

लोग कहते हैं ‘सब्र कर ले’,

पर हर रात रूह सिसकती है।


जिनसे उम्मीद थी, वो छूट गए,

सपने सारे हाथों से फूट गए।

दुनिया में अपनी जगह बनाने चला,

पर अपने ही दिल से रूठ गए।


सवाल है या कोई इल्ज़ाम है?

ज़िन्दगी का कैसा ये इंतज़ाम है?

खुश रहने का फ़र्ज़ निभा रहा हूँ,

पर अंदर से पूरा वीरान हूँ मैं।


मैं इंसान हूँ, पर पूरा नहीं,

अपने ही सच से अधूरा हूँ कहीं...



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