ख़त जो लिखा था कभी
ख़त जो लिखा था कभी
ख़त जो लिखा था कभी, अब भी रखा है,
तेरी यादों के साथ धुंधला सा पड़ा है।
स्याही कुछ बह चली, अल्फ़ाज़ धुँधले हुए,
पर जज़्बात वैसे ही, जैसे कल ही कहे।
वो आखिरी मुलाक़ात याद है मुझे,
तेरी आँखों की बेचैन बरसात याद है मुझे।
कुछ कहना चाहा था तूने, पर रुक गई,
वो अधूरी सी बात याद है मुझे।
मैंने भी हँसते हुए विदा कर दिया,
पर अंदर कहीं मैं भी रोया बहुत,
जो लफ्ज़ जुबां पर आ न सके,
उन एहसासों को मैं भी ढोया बहुत।
अब भी कभी बारिश होती है जब,
तेरा नाम बूँदों में सुनता हूँ मैं।
वो गलियाँ, वो मोड़, वो बीते हुए पल,
हर जगह बस तुझे ही ढूँढता हूँ मैं।
कभी लौट आना, वो ख़त पढ़ने,
जिसमें धड़कनें आज भी धड़कती हैं।
जो मैंने कलम से नहीं,
अपने दिल से लिखा था।
