मैं, बस मैं हूँ...!
मैं, बस मैं हूँ...!
मैं, बस मैं हूँ...!
अक्सर खामोश रहती हूँ, इसका मतलब यह नहीं कि मैं गूँगी हूँ।
मैं हर चीज़ को महसूस करती हूँ, देखती हूँ और समझती हूँ।
कभी परेशान भी रहती हूँ, लेकिन इसलिए नहीं कि मैं बेवकूफ़ हूँ।
मैं रास्ते ढूँढ़ना जानती हूँ। चट्टानों से लड़कर भी आगे बढ़ने का हौसला रखती हूँ।
मैं शांत हूँ, लेकिन हर बात को गहराई से महसूस करती हूँ।
खुद को मज़बूत ज़रूर दिखाती हूँ, पर दिल से कोमल और भावुक भी हूँ।
मैं अकेले चलने का साहस रखती हूँ, फिर भी लोगों के साथ मिलकर जीना पसंद करती हूँ।
अपने भीतर भावनाओं का समंदर समेटे हुए भी, सामने वाले का दर्द समझने और धैर्य से सुनने का साहस रखती हूँ।
अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखकर अपने सपनों की राह पर चलना भी जानती हूँ।
मैं मज़बूत हूँ, लेकिन अपनों के सामने फूट-फूटकर रोकर मन का बोझ हल्का करना भी जानती हूँ।
काँटों भरी राहों पर अकेले चलकर आगे बढ़ने का साहस है मुझमें।
बस कभी ज़रूरत पड़े, तो हौसला बढ़ाने वाला कोई साथ मिल जाए, तो किस्मत को भी हराने का दम रखती हूँ।
कभी उलझी-सी, कभी पूरी तरह सुलझी हुई।
कभी ठहर जाती हूँ, तो कभी मुसाफ़िर बनकर फिर चल पड़ती हूँ।
मैं पूर्ण नहीं हूँ, पर सच्ची हूँ।
मैं कमज़ोर नहीं, बस संवेदनशील हूँ।
मेरी खामोशी मेरी पहचान नहीं, मेरी गहराई है।
मैं... मैं हूँ।
जैसी हूँ, वैसी ही हूँ।
बस... मैं, बस मैं हूँ।
