STORYMIRROR

Archana Verma

Abstract

4  

Archana Verma

Abstract

मैं बदनाम

मैं बदनाम

1 min
238

ऐसा क्या है जो तुम मुझसे

कहने में डरते हो

पर मेरे पीछे मेरी बातें करते हो

मैं जो कह दूँ कुछ तुमसे

तुम उसमें तीन से पांच

गढ़ते हो

और उसे चटकारे ले कर

दूसरों से साँझा करते हो।


मैं तो हूँ खुली किताब

बेहद हिम्मती और बेबाक़

रोज़ आईने में नज़र

मिलाता हूँ अपने भीतर झाँक, फिर

 ऐसा क्या है जो तुम मुझसे

स्वयं पूछने में डरते हो ?


एक लम्बा सफर तय किया है मैंने

जहाँ भी आज मैं पहुंचा हूँ

गिरा संभाला पर अपना

स्वाभिमान बनाये रखा हूँ

 मेरे जूते पहन के ही तुम

उसके काटने की चुभन समझ

सकते हो।


वो जीवन ही क्या जिसमें

सुनाने को कोई कहानी न हो

जिनमें गलतियों से सीखने का

कोई सबक न हो

पर वो कहानी मैं तुम्हें सुनाऊँ

क्या इतनी समझदारी तुम रखते हो ?


मेरे जीवन में कई उलझनें हैं

जो शायद सुलझाने से भी

न सुलझेगी

पर उनके बारे में न सोचते हुए

तुम अपने काम से काम

क्यों नहीं रखते हो ?


डंके की चोट पे करता

हूँ हर काम

किशोर दा का गाना

बहुत आता है मेरे काम।


लोग कहेंगे

लोगों का काम है कहना "

यही गाना सुनते हुए अब

इस लेखनी को देता हूँ विश्राम।


मुझे क्या तुम सोचते रहो

और मेरी बातें करते रहो

क्योंकि "बदनाम" होने में भी

है बहुत नाम।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract