माटी में मिल जाना है
माटी में मिल जाना है
ए मानव आखिर क्यों इतना,
तू हरदम ही इतराता है।
इक दिन आखिर तो तुझको,
माटी में ही मिल जाना है।
जिस प्रकृति में जन्म पाया है तूने,
उसी से खिलवाड़ तू करता है।
प्रकृति के कहर से भी,
तू क्यों नहीं आखिर डरता है।
लालच की सीमा नहीं है तेरी,
हर बुरा कार्य तू बेझिझक करता है।
ईश्वर की नज़र है हर पल तुझपर,
जानकर भी अनजान बना फिरता है।
अपना सारा अमूल्य जीवन तू,
बिलकुल बेकार में गंवाता है।
तेरी धन दौलत और शानोशौकत को ,
साथ तेरे कहीं नहीं जाना है।
कितने ही पाप कमाकर तूने,
जो कुछ भी यहां पर पाया है,
वो सब कुछ छोड़कर यहीं पर,
अकेले ही इस जग से जाना है।
