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बेज़ुबानशायर 143

Abstract Fantasy Inspirational

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बेज़ुबानशायर 143

Abstract Fantasy Inspirational

मानसून की खुशी !

मानसून की खुशी !

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बहुत दिन बाद पकड़ में आई...

थोड़ी सी खुशी...तो पूछ लिया,

" कहाँ रहती हो आजकल....

ज्यादा मिलती नहीं....? ",

"यही तो हूँ" जवाब मिला।


" बहुत भाव खाती हो...

कुछ सीखो अपनी बहन से...

...हर दूसरे दिन आती है 

मिलने हमसे परेशानी ।"


" आती तो मैं भी हूं...लेकिन आप ध्यान नहीं देते " ।

"अच्छा...? कहाँ थी तुम जब पड़ोसी ने नई गाड़ी ली...? "


"आपकी बेटी की टेस्ट रिपोर्ट पढ़ रही थी...

जिस बीमारी का डर था वो नहीं निकली...

वही खड़ी चैन की सांस ले रही थी ".....।


कुछ शर्मसार तो हुए हम लेकिन हार नहीं मानी

" और तब कहाँ थी जब रिश्तेदार ने बड़ा घर बनाया....? "


" तब आपके बेटे की जेब में थी...

उसकी पहली कमाई बन कर "।


"और तब कहाँ थी..."

अगली शिकायत होंठों पे थी जब उसने टोक दिया बीच में।


"मैं रहती हूँ..…

कभी आपकी पोतियों की किलकारिये में,

कभी रास्ते में मिल जाती हूं एक बिछड़े दोस्त के रूप में,

कभी एक अच्छी फिल्म देखते हुए,


कभी गुम कर मिली हुई बालियों में,

कभी घरवालों की तालियों में,

कभी मानसून की पहली बारिश में,

कभी रेडियो पे पुराने गाने में,


दरअसल...थोड़ा थोड़ा बांट देती हूँ, खुद को

छोटे छोटे पलों में....उनके अहसासों में

लगता है चश्मे का नंबर बढ़ गया है आपके

सिर्फ बड़ी चीज़ों में ही ढूंढते हो मुझे


वहाँ भी आती हूं मैं...लेकिन कभी कभी

खैर...अब तो पता मालूम हो गया ना मेरा

अब ढूंढ लेना मुझे

लेकिन हाँ...चश्मे का नंबर बदलवा के ।।"



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