माँ को माँ से मिलवाते है
माँ को माँ से मिलवाते है
चलो आज माँ को माँ से मिलवाते है
माँ से पहले कैसी थी माँ ये बतलाते है
चुलबुली सी नटखट सी बाबा की बुलबुल
आँगन की नाजुक कली जो पली दुलार में
घर, आँगन, रसोई सब महकता चहकता
सारे पकवान बनते सिर्फ उसी के पसंद के
जुबां से निकलते ही सारी फ़रमाइश पूरी होती
दिन भर बस हँसते रहती कभी ना रोती
खाने का स्वाद, पूजा की थाली तीज त्यौहार दीवाली
घर आते ही सबसे पहले उनको पुकारा करते थे
माँ पापा सब उसे आँखों का तारा कहते थे
पूरे गली में उनसे खूबसूरत कोई ना था
तितली की तरह उड़ती नील गगन में
सपने बुनती सतरंगी आसमान पाने की
आँखों में कुछ कर दिखाने का जज़्बा
दिल में हजारों अरमान लिए ख़्वाब
डोली अरमानों की सजा चली पिया संग
तब से वो भूल गयी खुद को रंगी सबके रंग
माँ बनकर भूल गयी वो खुद को ही
अब उसकी दुनिया सिर्फ उसकी संतान
छोड़ आयी वो हँसी ठिठोली बाबुल के आंगन में
जिम्मेदारी के तले दबा दिए अपने सारे सपने
तो चलो आज उसी सपने से मिलवाते है
माँ को फिर से हँसना चहकना सिखाते है
फिर से उन्हें खुला आसमान देते है
जो भूल चुकी वो पहचान देते है
ममता भरे आँचल में प्यार भरते है
अपनी माँ को हम स्नेह का उपहार देते है।
