मां-एक ईश्वरीय स्वरूप
मां-एक ईश्वरीय स्वरूप
मां किस तरह मैं तेरा आभार प्रकट करूं,
शब्द कम पड़ जाएंगे प्रकट करने में
किस तरह तेरा ऋण चुका पाऊंगी,
जो तूने अपनी पूरी जिंदगी लगा दी है मुझे सवारने में।
नौ महीने तूने अपने गर्भ में रखकर पीड़ा भी सही हैना मां
बचपन में मेरी उंगली पकड़कर अब तक
जिंदगी का आईना भी तूने ही दिखाया हैना मां
पापा से मेरी कभी-कभी शिकायतें भी तूने ही छुपाई हैना मां
बाहर वाले के कुछ कहे देने पर उनका
मुंह भी तूने ही बंद किया हैना मां
दिल के दुखी होने पर अपने आंचल से
भी तू ही लगाकर रखती हैना मां
सबका इतना सुनने पर अपने मुंह पर
सदा हंसी बनाकर तू ही रखती हैना मां
ज्यादा भूख लगने पर अपनी थाली का
आधा खाना निकाल कर तू ही देती हैना मां
कहीं मेरे बाहर जाने पर सबसे ज्यादा
चिंता भी तू ही करती है ना मां
बचपन से लेकर अब-तक और आगे भी बिना
स्वार्थ के हमेशा मेरा साथ देनेवाली भी तू ही है मां
पूरे घर को अपने ऊपर निर्भर रखकर
स्वतंत्रता की मूरत भी तू ही है मां
अपनी पूरी जिंदगी दूसरों पर न्योछावर
करने वाली बलिदान की मूरत भी तू ही है मां
पहले से ज्यादा अब अपने दिल के
सभी पन्ने तेरे आगे खोलने लगी हूं मैं,
मां के साथ-साथ एक खास सखी बन गई है तू मेरे लिए
शायद पहले से भी ज्यादा अब तुझे
ईश्वर का दर्जा देने लगी हूं मैं,
जो तेरे सामने कभी बोल नहीं पाई
आज लिखकर व्यक्त कर रही हूं मैं
रोज-रोज तेरा भिन्न स्वरूप देखकर
तुझ में और डूबती जा रही हूं मैं,
शायद तुझ में समा रही हूं मैं,
मां तेरे ओर करीब आ रही हूं मैं।
