STORYMIRROR

Prince Sharma

Abstract

4  

Prince Sharma

Abstract

लुप्त होती चिड़िया

लुप्त होती चिड़िया

1 min
323

वह आती थीं मेरे बचपन 

के आँगन में अपने

पंख फैलाए हर दिन की

तरह एक नयां गीत गाते 

वे चिड़ियां,

जब आसमान में अपने 

साथी संग निकलती थी

तब गिनना चाहते हुए भी 

गिन नहीं पाते थे 

वसंत के बागो में खेतो में

छावं भरी शामो में 

मन को लुभा जाती थी

वे चिड़ियां,

नदी किनारे झील में 

बदलते मौसम के भीर में 

पेड़ों के उस डाली से 

सुखती हरियांली से 

क्यु दुर जाती हैं

वे चिड़ियां ,

इर्ष्या के इस वादी में 

गुनाह क्या है मेरा 

क्यु फिर एक नया

मील छोड़ जा रही हैं अकेला 

वे चिड़ियां~!



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract