लॉकडाउन-प्रकृति से पुनर्मिलन
लॉकडाउन-प्रकृति से पुनर्मिलन
आज मैं इस पिंजरे में बोर हो गई हूं
मैंने सोचा मैं भी
स्वच्छ हवा का आनंद ले आऊं
हवा के झोकों से बातें कर आऊं
चिड़ियों का चहचहाना सुन आऊं
जब घर से बाहर कदम रखना चाहा
तो लक्ष्मण रेखा ने वापिस अंदर
धकेल दिया
मन इस पिंजरे में फिर उदास हो गया
उदास मन से घर के बाहर ही खड़े
होकर देखा
ऐसा सन्नाटा तो पहले कभी नहीं देखा
मानो पक्षी भी घबरा गए यह सोचकर कि
यह मानव जाति कहां गई
कहीं-कहीं पेड़ों की खुशी जरूर दिखी
आज मुझे काटने वाला कोई भी नहीं है
तभी एक पक्षी
टकाटक मुझे देख
रहा था
जैसे मुझसे पूछ रहा हो कहां हो तुम मानव
और कहां है तुम्हारी दौड़ती हुई गाड़ियाँ?
मैं भी उसके ऊपर बैठकर कहीं दूर घूम आती थी
अच्छा नहीं लग रहा है मानव के बिना
दुख और चिंता
के समय मानो
वे भी कह रहे हो
तुम घबराओ नहीं
मानव
सब ठीक हो जाएगा
सब कुछ ठीक होते ही
बस तुम प्रकृति को संभालना
