वर्तमान और अतीत
वर्तमान और अतीत
मैं और बड़ी होने लगी हूं
मां के उन, ऊन के धागों की
तरह उलझने लगी हूं
बीते दिनों के साथ चलते-चलते
खोने लगी हूं
अतीत के ख्यालों में तैरने लगी हूं
कहने को छोटे-छोटे ख्याल थे
पर मैं उलझती गई
छोटे-छोटे ख्यालों के साथ बड़े-बड़े
ख्यालों में उलझी
बीते दिनों के साथ भटकती गई
ख्यालों ने मेरे दिल में लहरें उठाई
वो दरख़्त वो झूले के ख्यालों में खोई
दादी के प्यार को याद करने लगी
नानी की बातों को गले लगाने लगी
दादा नाना के दुलार में खोने लगी
कभी मां की डांट में उलझी तो
कभी मां के प्यार में सिमटती गई
कि कैसा वो मेरी मां का प्यार
और डांट था
जिंदगी में ऐसा प्यार और डांट
फिर कभी नहीं मिला
मां के प्यार में लाखों दुआएँ थी
पर डांट में तो करोड़ों दुआएँ छिपी थी
मां के आंचल के छनते हुए प्रकाश की
भीनी खुशबू में खोने लगी
वक्त सिमटता रहा उन उलझनों में
ख्याल से एहसास बन गए
बिखरते एहसास और ख्याल में कैद हुई
मेरे जीवन की वो ख़ुशियाँ
