लक्ष्य
लक्ष्य
परिंदों की मंजिल ऊंचाई तक जारी है
पर आसमान से पार जाना नामुमकिन है
कैसे भी हो हासिल लक्ष्य तो खुशी तो होनी हैं
मिले को छोड़कर दूसरे की आस बेतुकी है ।
चर्चा में आए इसलिए बहुत कुछ करना है
कुछ ना कर सके तो जीवन लगे बोझिल है ।
लक्ष्य के पूरा होते ही और दुसरा शुरू करना
चक्र है यह इसका कभी पूरा नहीं होना है ।
है दोनों हाथों में लड्डू तो बर्फी कैसे ले
एक हाथ के लड्डू को तो छोड़ना होगा
जीवन में मिले कुछ भी तो कमी है ना कहना
जो मिला है हमें ऐसा किसी के नसीब में नहीं है ।
पतझड़ के मौसम में सारे पत्ते झड़ रहे हैं
नये पत्तो के आने की राह आसान कर रहे हैं
जो मिला वो अगर छीन लिया जाता है
ऐसा कुछ अलग देने की कोशिश होती है ।
अगर आसमान छूने की कोशिश में रत होना है
परिंदों की तरह अंतिम सांस तक उड़ना है
करो मंजिल प्राप्त पर यह ध्यान रखना जरूरी है
वहां आसमान में किसी का सहारा नहीं मिलना है ।
